रामधन की कहानी !!
रामधन की कहानी !!
प्रणाम,
यह कहानी है रामधन और उसकी पत्नी संगीता की है| सर्दी के दिन थे । गांव में बीमारी का मौसम था । गांव में बीमारी इस तरह फैली थी कि हर कोई अपना बोरिया बिस्तर पकड़ के जहां मिले वहां पर अपना डेरा संभाल लेता| कई लोगों को मजबूरी में गांव छोड़ना पड़ा |उसी बीमारी की चपेट में रामधन और उसकी पत्नी संगीता भी आए थे|उनका घर तो पहले से ही टूटा था, सभी को देखते हुए रामधन और उसकी पत्नी ने भी फैसला कर लिया कि वह भी गांव छोड़कर कहीं और जाएंगे पर अपना डेरा बसाएंगे| काफी लंबा सफर तकरीबन 4 दिन तक चलते-चलते रामधन और उसकी पत्नी एक ऐसी जगह ठहरे जहां एक नदी बहती थी और काफी बड़ा जंगल था, जंगल के कारण वहां पर कोई रास्ता नहीं था रुकने का । पर रामधन और उसकी पत्नी को कोई उपाय नहीं सुजा। उन्होंने वहां पर अपना डेरा बसा लिया। 2 दिन तक खाने का कुछ इंतजाम नहीं हो पाया नदी का पानी और जंगल के कुछ पेड़ पौधो से रामधन और उसकी पत्नी को अपना पेट भरना पड़ा|
रहने के लिए तो बसेरा हो गया था । पर रामधन और उसकी पत्नी को अब खोज थी किसी काम की, मजदूरी की । दूसरे ही दिन सुबह सुबह जल्दी से रामधन अपने घर से निकल पड़ा । बहुत ढूंढने के बाद उसे पता चला कि जंगल के पास ही लकड़ी काटने का कारखाना है। जहां पर पुराने लकड़ियों से कागज बनाया जाता है ।फिर देर किस बात की थी, रामधन तो ऐसे भी मजदूरी की तलाश में था ही| रामधन पहुंचा कारखाने में, ठेकेदार से बात करने के बाद उसे लकड़ी काटने का काम मिल गया। रामधन बड़ा खुश था क्योंकि उसे काम मिल गया था 1 दिन की दिहडी थी ₹200, दोपहर तो हो चुकी थी रामधन ने ठेकेदार से विनती की ठेकेदार साहब मुझे आज से ही काम पर रख लीजिए | मुझे आज कि दिहडी आधी ही दीजिए रामधन बड़ी खुशी से काम पर लग गया। नया काम मिलने के बाद रामधन अपने काम में इस प्रकार मगन था की दोपहर से शाम और शाम से रात कब हो गई उसे पता ही ना चला। वहां पर ठेकेदार आया कहा रामधन अभी घर जाओ कल सुबह जल्दी आ जाना । रामधन को उस दिन की देहाडी ठेकेदार ने दी नहीं और कहां कि कल आ जाना कल सुबह जल्दी आना दोनों दिन की देहाडी एक साथ दे दूंगा |
यह सुनकर रामधन थोड़ा दुखी हो गया और रामधन जंगल से होते हुए अपने झोपड़ी में लौट आया संगीता को देखकर जैसे उसकी जान में जान लौट आयी, आते ही संगीता ने पूछा "कुछ खाने के लिए लाए हो"? रामधन बेचारा क्या कहता देहाडी तो उसे मिली नहीं थी । फिर क्या वही रोना था ।पानी पी के सोना था और पेड़-पौधों खाकर रात काटनी थी| रामधन, कब सवेरा होगा कब सूरज निकलेगा इसी इंतजार में था। सुबह की पहली रोशनी के साथ रामधन कारखाने की और चल पड़ा ठेकेदार आते ही सभी मजदूरों को लकड़ी काटने का काम दे दिया गया, शाम होते ही ठेकेदार सभी का काम देखने आया। रामधन ने उस दिन सबसे ज्यादा लकड़ीया काटी थी| ठेकेदार खुश हो गए। रामधन को उसकी 2 दिन की देहाडी देता है, देहाडी हाथ में आते ही रामधन को संगीता के शब्द सुनाई दिया ''कुछ खाने के लिए लाए हो'' ? शाम का समय था, रामधन कारखाने से बाजार की ओर निकल पड़ा। बाजार काफी लंबा था, जाने का कोई साधन नहीं था| रामधन कारखाने की ट्रक में ही चला गया, फिर क्या था ₹400 की मजदूरी मिली थी, हफ्ते भर का राशन रामधन ने खरीद लिया काफी समय बीत चुका था। रात हो गई थी, बारिश भी होने लगी थी रात के करीबन 11:00 बज चुके थे। रामधन तो इसी खुशी में था कि संगीता पूछे कि ''खाने के लिए कुछ लाए" हो तो पूरे हफ्ते का राशन दिखा दूंगा| रामधन अपनी झोपड़ी में पहुंच गया उसे लगा संगीता जोर से बुलाएंगे पर संगीता की आवाज सुनाई नहीं दी। काफी देर तक संगीता को रामधन खोजता रहा फिर सोचा कि नदी से पानी लेने गई होगी |
अब रामधन से रुका नहीं गया रामधन जैसे बावरा हो गया और नदी की ओर दौड़ने लगा । रास्ते में देखा तो क्या एक औरत जमीन पर गिरी पड़ी थी । बगल में पानी का मटका टूटा पड़ा था । वह कोई और नहीं संगीता ही थी, रामधन की तो जैसे जान ही निकल गई देखा तो क्या संगीता के मुंह से लार टपक रही थी और पांव पर सांप के काटने का निशान भी नजर आ रहा था| रामधन डर गया था । सास काफी धीमी धीमी चल रही थी। रामधन ने कुछ सोचा नहीं। कंधे पर संगीता को उठाते कारखाने की ओर दौड़ पड़ा। दूसरी तरफ जिस तरह रामधन दौड़ रहा था, उसी तरह बारिश भी तेजी से होने लगी। रामधन जैसे-तैसे कारखाने पहुंचा। लकड़ी के ट्रक में वैद्य के पास ले जाया गया। काफी समय निकल चुका था, वैद्य ने देखा तो संगीता की सांस रुक चुकी थी । वैद्य ने बड़ा दुखी होकर रामधन से ''आपकी पत्नी अब नहीं रही " रामधन की आंखों की रोशनी जैसे धुंधली से होने लगी। उसे जैसे लग रहा था संगीता अब उठ कर उससे पूछेगी "खाने के लिए क्या लाए"? रामधन सदमा सहन ना कर पाए और पागल जैसे हरकतें करने लगा। कई दिन बीत गए जंगल कटकर वहां पर बस्तियां बन गई। रामधन वही एक भिखारी और पागल की तरह हर घर में जाकर बोलता "मैं राशन ले आया", मैं राशन ले आया | हर बच्चे को रामधन की कहानी सुनाई जाती हैं |रामधन का दर्द और दुख रामधन के अलावा कोई नहीं जान पाया ना ही कोई उसका समझ पाए|
समय की किमत का बोध हमे इस कहानी से मिलता हे। एक कहावत हे की "पानी बह जाये उसके बाद दिवार बनाने का कोई फायदा नही होता हे" क्युंकि बहे हुवे पानी को आप रोक नही सकते। वेसे ही समय पे पैसे, राशन और इलाज ना मिलने से राम धन अपनी पत्नी संगीता को नही बचा पाया। इस लिये समय को अनमोल कहा गया हे।
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